Sunday, April 30, 2006

सूखा


सूखी है नदिया
खाली गगरिया
पनघट हुए विरान
नदी किनारे
गांव है सूना
बँजर भए खलिहान

जाने कब थी
बिजली चमकी
कब बादल थे गरजे
कब सौंधी सी
महक उठी थी
कब जलधर थे बरसे

आग उगलते
सूरज ने
लाखों का जीवन फूंका
आँखों में
लहराया सावन
पर धरती पर सूखा ।।

3 comments:

अनूप शुक्ला said...

बड़ा बढ़िया गीत लिखा है आपने तो! बधाई!

renu ahuja said...

रत्ना जी, सूखे पर लिखी आपकी कविता बहुत सुंदर लगी. हम कहेंगे इतना ही:-
जब जब जीवन गीत मे
भैरव राग छिड़ जाएगा
रुखे मन और सूखे नयनों से
व्यथा-नीर बह जाएगा...!!!

शुभकामनाएं
-रेणु आहूजा.

रत्ना said...

धन्यवाद रेणू जी, राग का सुर मधुर है।