Tuesday, June 27, 2006

देखो कैसा खिलखिलाया है चाँद

पेड़ो के पीछे से
बादल के नीचे से
अम्बर पर देखो
निकल आया है चाँद

आँचल ढलकाए
जुल्फें बिखराए
बिस्तर पर लेटा
अलसाया है चाँद

ये मेरा प्रतिबिम्ब है
या मेरा प्रतिद्वन्दी
देखकर परस्पर
भरमाया है चाँद

पूनम की रात है
तारों का साथ है
किस्मत पर अपनी
इतराया है चाँद

फैला उजियारा है
पिया से हारा है
हरकत पर अपनी
शर्माया है चाँद

वक्त बदल जाएगा
कल रूप ढल जाएगा
भीतर ही भीतर
घबराया है चाँद

कल किसने देखा है
ये पल तो उसका है
सोचकर यह सच
मुस्काया है चाँद

देखो कैसा खिलखिलाया है चाँद
आज कुछ ज्यादा निखर आया है चाँद ।।

4 comments:

ई-छाया said...

पूनम की रात है
तारों का साथ है
किस्मत पर अपनी
इतराया है चाँद

बहुत सुंदर है।

अनूप शुक्ल said...

बहुत सुंदर !कविता पढ़कर याद आई लाइनें:-
चांद तुम्हें देखा है पहली बार,
जाने क्यों लगता ऐसा हर बार।

प्रेमलता पांडे said...

अति सुंदर, कोमल और मीठे भाव।
प्रेमलता

Manish Kumar said...

वक्त बदल जाएगा
कल रूप ढल जाएगा
भीतर ही भीतर
घबराया है चाँद
चाँद की इस मानसिकता को खूब उभारा है आपने इन पंक्तियों में !