Tuesday, May 02, 2006

उधार नहीं

युगल जी की प्रशंसा और प्रश्न के जवाब में कुछ पंक्तियां हाजिर है -----

भारत आज़ादी पाएगा,जन जन समृद्ध हो जाएगा
देखे जो सपने बुज़र्गों ने ,वो हुए कभी साकार नहीं

आज सजी दुकानें समानों से पर आँख अटी अरमानों से
छपते है नोट हज़ारों के जन जेब में पर खनकार नहीं

हैं बिजली के उपकरण बहुल पर बिजली रहती अक्सर गुल
कारें तो दिखें कतारों में,सड़कों का स्थिती सुधार नहीं

कट रहे हैं जंगल हरे भरे,धरती पर रेत के ढेर बढ़े
कूड़ा करकट दर दर फैला शूद्ध हवा भी अब दरकार नहीं

फुव्वारे नीर बहाते हैं और दरिया रीते जाते है
बिन पानी श्वास लता सूखे नल में जल की पर धार नहीं

अनाज गोदामों में सड़ता और भूख से रोज़ कोई मरता
शासन को तो बहुतेरे हैं कोई काम का पर हकदार नहीं

रिश्वत का हुया बाज़ार गर्म, बन गया है भ्रष्टाचार धर्म
बंटे भारतवासी टुकड़ों में ,सरकार को पर सरोकार नहीं

बम और बन्दूक खुले बिकते, हंसते इन्सां पल में मिटते
लुटती अस्मत बाज़ारों में, जीवित मानव संस्कार नहीं

अब मंगल ग्रह पर जाएगें और चाँद पर बस्ती बसाएगें
इस धरती पर तो जीने के दिखते अच्छे आसार नहीं

क्योंकर पर पीठ दिखाएगें स्वराज सुराज्य बनाएगें
बेबस होकर और घुट घुट कर जीने को हम तैयार नहीं
ये देश हमारा अपना है कोई मांगा हुया उधार नहीं ।।

जी हाँ , ये देश हमारा है , इसे हमें ही बनाना हैै । नरसंहार में मरते नर नहीं बल्कि मानवता मरती है और मानवता को जीवित रखना मानव धर्म है ।

4 comments:

युगल मेहरा said...

पहले तो इतनी अच्छी कविता के लिये बधाई प्रेषित करता हूँ।
वाकई में असली भारत का चित्रण कर दिया है आपने।
अन्तिम पन्क्तियां काबिले तारीफ है, तथा इससे आपकी मनस्थिति का आभास होता है।
एक बार फिर से बधाई

Udan Tashtari said...

अब मंगल ग्रह पर जाएगें और चाँद पर बस्ती बसाएगें
इस धरती पर तो जीने के दिखते अच्छे आसार नहीं


--बहुत बढियां,

समीर लाल

रजनीश मंगला said...

बहुत अच्छा

Narad Muni said...

कविता तो बहुत सही लिखी है। मजा आ गया।
लेकिन एक शिकायत है, उसे दूर करिए|आप अपनी ब्लॉग पोस्ट मे टाइटिल नही डालतीं।शायद आपने ब्लॉगर पर इसे इनेबल नही किया है, तो करिये ना।

go to Setting/Formatting &
change Show Title field to YES.
बस हो गया।