Thursday, May 04, 2006

विवाह-विज्ञापन

चाहत है हमें एक ऐसी वधू की
हो जो सरल ,सुशिक्षित और सुन्दरी
पाश्चात्य संस्कृति से सर्वथा अन्जान हो
किन्तु रखती अंग्रेज़ी का अदभुत वो ज्ञान हो
संस्कारो में पली हो,
दूध से धुली हो,
गृह कार्यों में दक्ष हो
सर्वो सेवा उसका लक्ष्य हो
रखे पति गृह को सदा वो सहेज के
लोभी नहीं हम अच्छे दहेज़ के
दहेज तो दिखाता है रिश्तों का प्यार
इन्कार क्यों करे हम जो दें वो अपार

तलाश है उन्हें भी एक ऐसे सुयोग्य वर की
जिस पर कोई जिम्मेवारी ,न हो उसके घर की
नाज़ों पली कन्या के नखरे उठाए
छुट्टी के दिन उसे मायके ले आए
दिखने में वो हो सुन्दर सजीला
परिवार से दूर रहता हो अकेला
लाखों कमाने में वो दक्ष हो
विदेश में बसना उसका लक्ष्य हो
माता पिता उसके धनवान हो
समाज में उनका सम्मान हो
शादी का खर्चा वो मिल कर उठाएं
बुरा कुछ लगे तो बस चुप लगाएं

इधर वर पक्ष की अनेकों अपेक्षाएं
उधर वधू पक्ष की अंसख्य इच्छाएं

था जो पहले दो परिवारों
दो आत्माओं का मेल
बना वो विवाह बन्धन
आज रस्साकशी का खेल
दोनों पक्ष एक दूसरे को
नीचा दिखाने पर तुले है
इस खींच तान में, न जाने
कितने बन्धन खुले है
तभी शायद कुछ युवा
इस बन्धन से आज़ाद है
रखते अपनी गृहस्थी को
बिना विवाह आबाद है

समाज नई सदी में,
माना, प्रवेश कर रहा है
पर कर्णधार भविष्य का
न जाने कहाँ और कैसे पल रहा है ।।


3 comments:

Udan Tashtari said...

क्या बात है,रत्ना जी।
वर्तमान परिपेक्ष का जीवंत चित्रण-बहुत सुंदरता से संवारा है शब्दों को।

समीर लाल

रजनीश मंगला said...

बहुत बढ़िया रत्ना जी

मिर्ची सेठ said...

अरे वाह, रत्ना जी आप तो वाकई सरल शब्दों में गूढ़ बाते कह जाती हैं। भला हो इंटरनेट का जिसने सभी को आजादी दी है लिखने वालों को लिखने की व पढ़ने वालों को पढ़ने की। विन्सेंट सर्फ की जय।

पंकज