Friday, May 05, 2006

विश्वास

विश्वास जो बिखरा तो उभरी शिकायत
शिकायत ने चुप्पी की चादर ली ओढ़
गुप चुप सा फैला गलतफहमी का कोढ़
चाहत के चेहरे पर बदली लिखावट
रिश्ते की राहों में आया एक मोड़ ।।


7 comments:

Sagar Chand Nahar said...

रत्ना जी,
कवितायें वाकई अच्छी लिखती है आप, यह समीर लाल जी के लेख से प्रभावित हो कर कॉपी पेस्ट नहीं कर रहा हुँ, बकायदा लिख कर पोस्ट कर रहा हुँ। एक सुझाव है अगर कविताओं में फ़ोन्ट की साईज थोड़ी छोटी हो तो ज्यादा अच्छा लगेगा।

अनूप शुक्ला said...

बढ़िया है। कुछ लंबाई बढा़इये कविता की। संकोच न करें हम पढ़ रहे हैं। पहले वाली भी पढ़
चुके हैं। सबकी तारीफ इधर ही स्वीकार करें।

RC Mishra said...

शब्द संचयन को माध्यम बनाकर बडी गहरी बात कह डाली.

Udan Tashtari said...

वाह, अच्छा लिखा है, मगर अनूप जी सही कह रहे हैं थोडा और जोडो.

समीर लाल

ई-छाया said...

गूढ अर्थों वाली बेहद संक्षिप्त कवितापंक्तियों की रचना के लिये बधाइयॉ

मिर्ची सेठ said...

रत्ना जी

शादीशुदा लोगों को यह चौपाई लिख कर अपने बटूए में रख लेनी चाहिए। खास कर यदि आप की नई नई शादी हुई है व आप पहले महीनों में पा रहे हैं कि आज तो घर में यह टूटा या वह टूटा।

पंकज

रत्ना said...

सुझावों के लिए धन्यवाद ,यत्न करूगी कि अगली रचना में आपकी शिकायत दूर हो । आप को मेरी रचनाएं पसंद आ रही है इसके लिए मै आभारी हूँ ।